Srimad Valmiki Ramayana

इह वा मां मृतां कुब्जे नृपायावेदयिष्यसि ।
वनं तु राघवे प्राप्ते भरतः प्राप्स्यति क्षितिम् ॥२-९-५८॥
iha vā māṃ mṛtāṃ kubje nṛpāyāvedayiṣyasi |
vanaṃ tu rāghave prāpte bharataḥ prāpsyati kṣitim ॥2-9-58॥
Translation
O Hunchback (Manthara), either you will report to the King that I have died here, or, once Rama has gone to the forest, Bharata will obtain the kingdom.
हिंदी अनुवाद
हे कुब्जे! या तो तुम राजा को मेरे यहीं मर जाने की सूचना दोगी, या (जब) राम वन को चले जाएंगे, (तब) भरत इस पृथ्वी (राज्य) को प्राप्त करेंगे।
English Commentary
The Fatal Ultimatum: This verse encapsulates Kaikeyi's absolute resolve (often described as Hatha or obstinacy). She presents a binary outcome: Victory or Death. There is no room for negotiation or compromise. She is effectively holding her own life hostage to secure Bharata's future.
The Shift in Priority: Previously, Kaikeyi loved Rama like her own son. Here, her maternal affection has been completely displaced by political ambition for Bharata and fear for her own status, instilled by Manthara.
The Structure: The use of "Vā" (Or) sets up the condition. The only alternative to her death is the fulfillment of Manthara's plan: Rama's exile (Vanam) and Bharata's coronation (Kṣitim).
हिंदी टीका
इस श्लोक में कैकेयी ने स्थिति को 'जीवन और मरण' के प्रश्न में बदल दिया है। उनके कथन में दो ही विकल्प हैं, और बीच का कोई रास्ता नहीं है। 'इह वा मां मृतां' (यहाँ मेरी मृत्यु): कैकेयी ने भावनात्मक ब्लैकमेल (Emotional Blackmail) का सबसे घातक हथियार उठाया है। वह कहती हैं कि यदि मेरी बात नहीं मानी गई, तो मैं प्राण त्याग दूँगी और तुम्हें राजा को मेरी मृत्यु की सूचना देनी होगी। यह दर्शाता है कि वह अपने उद्देश्य के लिए किसी भी हद तक—यहाँ तक कि आत्मदाह तक—जाने को तैयार हैं। 'वनं तु राघवे' (राम का वनवास): यहाँ कैकेयी की ममता की विकृति स्पष्ट होती है। जिस राम को वह भरत से अधिक प्रेम करने का दावा करती थीं, अब उनके लिए 'वन' का विधान कर रही हैं। 'भरतः प्राप्स्यति क्षितिम्': उनका एकमात्र लक्ष्य भरत के लिए 'क्षिति' (पृथ्वी/राज्य) प्राप्त करना है। 'क्षिति' शब्द का प्रयोग यह दिखाता है कि अब उन्हें केवल सत्ता और भूमि का लोभ है, धर्म या संबंधों का नहीं। यह श्लोक कैकेयी के मानसिक पतन का पूर्ण चित्र है। पुत्र-मोह में वह इतनी अंधी हो चुकी हैं कि उन्हें न तो पति के प्राणों की चिंता है (क्योंकि उनकी मृत्यु का समाचार राजा दशरथ के लिए घातक होगा) और न ही राम के भविष्य की। यह हठ ही अंततः दशरथ की मृत्यु और अयोध्या के शोक का कारण बनता है।