Srimad Valmiki Ramayana

KISHKINDHA KANDASARGA: 55SHLOKA: 23
Srimad Valmiki Ramayana - Kishkindha Kanda - Sarga 55

स संविशद्भिः बहुभिः महीधरो महाअद्रि कूट प्रमितैः प्लवंगमैः ।
बभूव सन्नादित निर्दर अन्तरो भृशम् नदद्भिः जलदैः इव अंबरम् ॥ ॥४-५५-२३॥

Sa saṃviśadbhiḥ bahubhiḥ mahīdharo mahāadri kūṭa pramitaiḥ plavaṃgamaiḥ । Babhūva sannādita nirdara antaro bhṛśam nadadbhiḥ jaladaiḥ iva ambaram ॥ ॥4-55-23॥

Translation

With those many monkeys, who resembled great mountain peaks, sitting down (to fast) and wailing, the caves of that mountain resonated loudly, just as the sky resonates with thundering clouds.

हिंदी अनुवाद

पर्वतों के शिखरों के समान विशालकाय उन बहुत से वानरों के (प्रायोपवेशन के लिए) बैठने और विलाप करने से उस पर्वत की कंदराएँ वैसे ही गूँज उठीं, जैसे बादलों की गर्जना से आकाश गूँज उठता है।


हिंदी टीका

वाल्मीकि जी यहाँ एक भव्य उपमा (Simile) का प्रयोग करते हैं। वानरों की तुलना 'महाअद्रि कूट' (महान पर्वत चोटियों) से की गई है, जो उनके विशाल आकार को दर्शाता है। उनके रोने की आवाज़ से पर्वत की गुफाएँ ('निर्दर अन्तर') गूँज उठीं। 'जलदैः इव अंबरम्'—जैसे बादल आकाश को गुंजा देते हैं, वैसे ही वानरों के विलाप ने वातावरण को भर दिया। यह प्रकृति और पात्रों की भावनाओं का एकीकरण है। उस निर्जन स्थान में इतना शोर किसी अनहोनी का संकेत दे रहा है, जो अगले सर्ग में जटायु के भाई संपाति को आकर्षित करेगा.